कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं? जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!
बच्चों के अंदर सहनशीलता लाने के लिए हमें खुद उनका रोल मॉडल बनना होगा, हमें खुद एक उदाहरण के तौर पर स्वयं को अपने बच्चों के सामने पेश करना होगा।
दोस्तों आज हम जिस विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं, वह है बर्दाश्त करना या धीरज रखना।
मैंने सड़कों पर चलते समय देखा है कि गाड़ी में ज़रा सी टक्कर या खरोंच लग जाए तो लोग जान लेने पर आमादा हो जाते हैं क्यों? क्योंकि यह ज़रा सी टक्कर या खरोंच उनसे बर्दाश्त नहीं होती। बेशक वो किसी की जान ले बैठे।
कुछ दिन पहले मैंने अखबार में पढ़ा था कि एक बच्चा अपनी मां से नए जूतों की जिद कर रहा था। उस समय पैसों की तंगी के कारण मां उसे जूते नहीं दिला पा रही थी, बस इसी बात से नाराज़ हो बच्चे ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
एक और उदाहरण एक विद्यालय का है। यहां टीचर ने गृह कार्य न करने पर बच्चे को डांटा तो बच्चे ने उल्टा उन पर हमला कर दिया। कहीं कहीं तो मां-बाप ने पढ़ने के लिए डांटा तो आत्महत्या कर ली और तो और आज बहुत से परिवार इसलिए टूट रहे हैं क्योंकि लोगों में बर्दाश्त करने की क्षमता ना के बराबर हो गई है। दुःख होता है जब ऐसी घटनाएं सुनती हूँ पर इसका कारण शायद हम खुद ही हैं।
मैंने बड़े -बड़े समझदार और पढ़े-लिखे लोगों को भी देखा है, जब वो छोटी-छोटी बातों पर आपस में उलझ बैठते हैं। जब हम स्वयं इतने अधीर हैं तो बच्चों के सामने क्या उदाहरण रखेंगे।
आज के बच्चों में धैर्य की कमी आती जा रही है, जो उन्हें अपराध और पतन की ओर ले जा रही है। बच्चों की परवरिश किसी तपस्या से कम नहीं होती, बहुत त्याग करने पड़ते हैं तब जाकर संतान योग्य नागरिक बनते हैं।
एक और बड़ी बात, आज का प्रचलन है – हम किसी से कम नहीं! यह बहुत बड़ी बीमारी है जो हमारे रिश्ते, हमारी संवेदना और हमारे नौनिहालों को दीमक की तरह चढ़ती जा रही है। और बुरा मत मानिएगा, यह सीख अपने बच्चों को हम ही देते हैं।
‘हम किसी से कम नहीं!’ यह सोच आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे सकती है, बशर्ते हम अपने बच्चों को इसके सही मायने बताएं। बर्दाश्त करना और सहना दो अलग बातें हैं। फिर भी मैं यह नहीं कहती कि अत्याचार बर्दाश्त करें लेकिन जहां तक हो सके लड़ाई-झगड़े को टालना चाहिए, यह आखिरी रास्ता होना चाहिए।
बच्चों के अंदर सहनशीलता लाने के लिए हमें खुद उनका रोल मॉडल बनना होगा, हमें खुद एक उदाहरण के तौर पर स्वयं को अपने बच्चों के सामने पेश करना होगा। घर पर हम अपने बच्चों को उनकी गलतियों पर उन्हें समझाएं, उन्हें बताएं कि उन्होंने क्या गलती की और यह भी बताएं कि वह इस गलती को करने से कैसे बच सकते थे। उनकी हर बात को बड़े धैर्य पूर्वक सुनें, समझें।
मैं जानती हूं कि यह मुश्किल होता है पर मैं यह भी जानती हूं कि नामुमकिन भी नहीं और अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपने स्वस्थ समाज के भविष्य के लिए हमें यह करना ही होगा। बच्चों के मन में अपने प्रति आदर और प्यार के भाव पनपने दें ना कि डर और कुंठा के।
आशा करती हूं ये लेख सभी को पसंद आया होगा। इस विषय पर आप सभी के विचार, सुझाव और जिज्ञासाएं सादर आमंत्रित हैं।
मूल चित्र : Canva
read more...
Please enter your email address