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विराली मोदी कहती हैं कि जीवन की हर लड़ाई आपको अकेले लड़नी होती है, आपको बैसाखी की तरह आसपास सहारे मिल जाते हैं लेकिन फिर भी चलना आपको ही है।
पिछले महीने जब विराली को मुंबई में विमेंस वेब ऑरेंज फेस्टिवल के दौरान स्टेज पर देखा तो उनके चेहरे के उस अद्भुत तेज़ और उनकी सहजता ने मुझे उनके बारे में और जानने को विवश कर दिया। जल्द ही मेरी ख्वाइश पूरी हुई, मेरे एक संदेश पर ही वो इस साक्षात्कार के लिए राजी हो गईं।
इंटरनेशनल विमेंस डे 2020 के अवसर पर, मेरी तरफ से ये लेख, एक सप्रेम भेंट उन्हें और आप सबको।
तीस वर्ष की इस छोटी आयु में भी विराली मोदी, जो एक विकलांगता अधिकार वकील भी हैं, ने अपने जीवन में एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। इतनी छोटी उम्र में एक प्रेरक वक्ता, एक प्रसिद्ध मॉडल तथा सन 2017 में बीबीसी की प्रमुख 100 महिलाओं में स्थान पा चुकी हैं। कोरा (Quora)पर उनके एक लाख से अधिक फॉलोवर्स हैं और उनके लिखे प्रेरणात्मक जवाबों को एक करोड़ से ज्यादा बार पढ़ा जा चुका है।
विराली का कहना है कि उनके इस सफर की शुरुवात कोरा पर लिखने से हुई जो एक जो एक प्रचलित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है।कोरा पर लोग विभिन्न विषयों पर सवाल पूछते हैं तथा विषय के जानकार उनके जवाब लिखते हैं। विराली के हर तरह के जवाब लिखे लेकिन वे मुख्यतः निराशा से घिरे, जीवन में हताश लोगों के सवालों के जवाब जवाब देती थीं। उनके जवाबों में एक अद्बुत सकारात्मक ऊर्जा थी। कभी हार ना माननेे वाली और दृढ़ इच्छाशक्ति से भरपूर उनके जवाबों से उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ती गई।
उनकी इस लोकप्रियता की बदौलत उन्हें टेडेक्स नामक प्रसिद्ध कार्यक्रम में प्रेरक वक्ता के रूप में बुलाया गया।
यह सब पढ़ते हुए आपके जहन में यह सवाल अवश्य आया होगा कि विराली को इतनी सकारात्मक ऊर्जा कहां से मिलती है इसकी वजह है विराली मोदी ने स्वयं यह जीवन जिया है। 14 वर्ष की छोटी आयु में ही वे एक गंभीर बीमारी का शिकार हुई जिसकी वजह से उनके शरीर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। पिछले 13 सालों से व्हीलचेयर पर रहते हुए उन्होंने ये सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। विराली का जन्म अमेरिका हुआ। सन 2006 में अपनी भारत यात्रा के कुछ दिनों बाद में एक दिन उन्हें तेज़ सिरदर्द और फिर बुखार हुआ। चिकित्सकों ने मामूली बुखार समझकर उन्हें कुछ दवाइयां दे दी पर उन्हें आराम नहीं हुआ और तबीयत बिगड़ती गई । 2 साल के लंबे इलाज के बाद आखिर में पता चला कि उन्हे ट्रांस्वर्स मायलिटिस है। यह एक न्यूरोलॉजिकल अवस्था है, जिसमें रीढ़ की हड्डी में सूजन आ जाती है और नर्व फ़ाइबर्स क्षतिग्रस्त हो जाते हैं ।
ज़रा सोचिए पैरों में लगी मामूली चोट ही हमें कितना परेशान करती है ।हम चाहते हैं कि मजबूरी व झुंझलाहट से भरे दिन जल्दी से जल्दी खत्म हों जाएँ ।वहीं विराली मोदी इतने लंबे समय से एक दिव्यांग के रूप में जीवन जी रहीं हैं। उनके माथे पर कहीं कोई शिकन नहीं होती और हमेशा अपने चेहरे पर मुस्कान सजाये होती हैं। वे कहती हैं कि उन्होंने स्वयं इस बीमारी के बाद बहुत बुरा समय देखा है। वे निराश, हताश और तनावग्रस्त थीं। वे अपने इस नए जीवन का पूरा श्रेय अपनी मां को देती हैं। वे कहती हैं कि उनकी मां ने उन्हें स्वयं से प्रेम करना सिखाया और स्वयं को स्वीकार करना सिखाया और यही खुशहाल जीवन जीने की और उनका पहला कदम था। मॉडलिंग की दुनिया में जाना उनका एक सपना था और अपनी और इस हादसे के कुछ वर्षों बाद ही उन्होने मिस व्हीलचेयर का पुरस्कार जीता। उनकी यह बीमारी उनके हौंसले से हार गई।
#MyTrainToo से भारतीय रेलवे के लिए शुरू किया गया एक अभियान है। यह अभियान इसलिए शुरू किया क्योंकि जब विराली मुम्बई में थीं, तो उन्होंने तीन बार एक्सप्रेसवे ट्रेनों से यात्रा की थी, जहां पहुंच की कमी के कारण उनसे छेड़छाड़ की गई थी। उनके इस अभियान की वजह से पूरे केरल में पोर्टेबल रैंप और गलियारे के आकार के व्हीलचेयर को लागू किया गया है। छह रेलवे स्टेशनों को दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाया गया। विराली कहती हैं की दिव्यांग लोगों को ज्यादातर समय अवहेलना होती है, जो अनुचित है। वे सिर्फ इसलिए ये लड़ाई लड़ रही हैं ताकि समाज में उनके जैसे और लोगों को समान अवसर मिलें।
विराली का कहना है कि हर इंसान में कोई ना कोई कमी होती है हमें उस कमी के बावजूद स्वयं को स्वीकार करना होता है । जब आप अपने आप से प्यार करने लगते हैं तो बाहरी दुनिया आपको कैसे देखती है या आपके बारे में क्या सोचती है जैसे सवाल खत्म हों जाते हैं। वे यह भी कहती हैं की जीवन की हर लड़ाई आपको अकेले लड़नी होती है आपको बैसाखी की तरह आसपास सहारे मिल जाते हैं लेकिन फिर भी चलना आपको ही है। मानव की दृढ़ इच्छाशक्ति की जीती जागती मिसाल हैं विराली मोदी।
विराली के प्रेरणादाई विचारों के बारे में और जाने के लिए आप उन्हें कोरा या ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं।
मूल चित्र : Wikipedia
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