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बेटी के पूछने पर कि उन्हें कैसे पता, माँ ने कहा, “बेटा, मैं तुम्हारी माँ हूँ और माँ सब जानती है क्योंकि उसने आपसे ज्यादा दुनिया देखी है।”
“बेटा! मैं, तुम्हें सुबह से देख रही हूँ कि मेरे पीछे पीछे घूम रही हो। मुझे लग रहा है कि तुम कुछ बोलना चाहती हो, कुछ बताना चाहती हो। बोलो क्या बात है?” रोहिणी ने अपनी 17 वर्षीय बेटी मानसी से पूछा।
“हाँ मम्मी, कुछ बात करनी है।” मानसी ने आवाज़ धीमी करते हुए कहा।
“हाँ, तो बोलो ना बेटा क्या बात है?”
“मम्मी, मेरे दोस्तों ने पैसे नहीं दिए। मैं जब भी मांगती हूँ तो वे सभी कोई न कोई बहाना बना देते हैं।”
“तुम किस पैसे की बात कर रही हो बेटा?”
“मम्मी, आपको याद है वह ₹5000 जो मैंने आपसे दो महीने पहले लिए थे।”
रोहिणी याद करने लगती है। दो महीने पहले एक दिन मानसी ने मम्मी से कहा, “माँ मुझे ₹5000 चाहिए।”
“लेकिन क्यों बेटा? क्या करोगी इतने पैसे का?”
“वो मम्मी 5 सितंबर को मेरी टीचर जी का जन्मदिन है और टीचर्स डे भी है तो हम कुछ दोस्तों ने मिलकर उनके लिए एक छोटी सी सरप्राइज पार्टी प्लान किए हैं। उसमें जो भी खर्च आएगा हम सभी मिलकर थोड़ा-थोड़ा कॉन्ट्रिब्यूट करेंगे।”
“एक छोटी सी पार्टी के लिए 5000 रुपए?”
“नहीं मम्मी, पार्टी का टोटल खर्चा ₹5000 आएंगे जिसमें मिस के लिए एक ड्रेस, पेन, हैंडबैग और एक छोटा सा केक लूंगी।”
“जब सबको कॉन्ट्रिब्यूट करना है फिर तुम अकेले क्यों पैसे दे रही हो?”
“नहीं, वे सभी पैसे देंगे पर बाद में। उन सब के पास अभी पैसे नहीं हैं। सबने कहा कि तुम्हारे मम्मी पापा दोनों कमाते हैं, फिर तुम जब भी पैसा मांगती हो मिल जाता है तो तुम अभी खर्च कर दो बाद में हम, तुम्हें थोड़ा-थोड़ा करके दे देंगे।”
“पर बेटा! अगर उन्होंने तुम्हारे पैसे नहीं लौटाए तो? क्यों ना तुम भी पार्टी करने के बजाय व्यक्तिगत तौर पर कोई गिफ्ट दे दो टीचर जी को।”
“नहीं मम्मी, वे सभी पैसे जरूर लौटाएंगे। मैं, अच्छी तरह से जानती हूँ अपने दोस्तों को।”
तब मन नहीं रहने के बावजूद रोहिणी ने बेटी को 5000 रुपए दे दिए। बेटी उसी पैसे के बारे में बात कर रही है।
“हाँ-हाँ बेटा! याद आ गया। पर तुमने तो कहा था कि मैं अपने दोस्तों को अच्छी तरह जानती हूँ वे पैसे लौटा देंगे।”
“हाँ मम्मी, लगा तो मुझे भी था पर वे पैसे देने में अब टालमटोल कर रहे हैं। कहते हैं कि तुम तो पैसे वाले की बेटी हो, चाहो तो हर महीने 5000 खर्च कर सकती हो क्या इतने से पैसे के लिए पीछे पड़ी हो।” इतना बोल वह सर झुका कर सिसकने लगी।
रोहिणी ने बेटी को गले लगाते हुए कहा, “मुझे तो उसी समय पूरा यकीन हो गया था कि पैसे अब तुम्हें वापस नहीं मिलने वाले। खैर कोई बात नहीं पैसे कहीं व्यर्थ नहीं गए। लेकिन आगे से ध्यान रखना। बेटा, ऐसी बातें बहुत कुछ सीखा जाती हैं। मैं यह नहीं कह रही कि सब एक जैसे हैं पर बहुत से ऐसे लोग हैं जो दूसरे के भरोसे अपना काम निकलवाना और अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।”
“मम्मी, आपको सब कुछ कैसे पता होता है और पता था तो आपने मुझे रोका क्यों नहीं?”
“बेटा, मैं तुम्हारी माँ हूँ और एक माँ ज़्यादा जानती है क्योंकि वह आपसे ज्यादा दुनिया देखी है, ज्यादा अनुभव है। मुझे तो यह भी पता था कि तुम्हें पैसे नहीं मिले और उसी के बारे में बात करना चाहती हो। फिर भी मैंने तुमसे नहीं पूछा क्योंकि मुझे पता था तुम खुद आकर मुझे बताओगी।”
“तुम बोल रही हो रोका क्यों नहीं। याद है जब मैंने एक बार मना किया तो तुम कितना उदास हो गई थी, आंखों में आंसू आ गए थे। कहने लगी कि नहीं, मैं अपने दोस्तों को जानती हूँ वे पैसे लौटाएंगे। फिर मैंने यह सोचकर भी पैसे दिए कि अगर वे लौटाए तो सही अगर नहीं भी लौटाए तो तुम्हें एक सबक मिलेगी, सीख मिलेगी। देखो, जीवन में गलतियां करना गलत नहीं है पर गलतियों से हमें सीखना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि वह गलतियां दोबारा ना हो।”
“हाँ मम्मी, समझ गई। अब आगे से ऐसी गलतियां नहीं करूंगी।” ये बोल वह माँ से लिपट गई।
अभी मानसी अपने शहर छोड़कर दूसरे शहर में पढ़ने चली गई। हॉस्टल में रहती है पर एक एक रुपए का हिसाब डायरी में लिखती है। वो एक रुपए भी व्यर्थ खर्च नहीं करती। जब भी माँ उससे मिलने जाती है, मानसी टोटल हिसाब मां को बताती है कि कहां, कितना खर्च हुआ!
मूल चित्र : Still from Dost/Safi Ad via YouTube
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